OSHINAM
विधि 81 से 108: परम निर्वाण
अपने चारों ओर की खाली जगह (Space) को देखें। धीरे-धीरे महसूस करें कि आप स्वयं वह खाली जगह ही हैं।
किसी को देखें, पर उसके बारे में कोई राय न बनाएं। केवल शुद्ध देखने की क्रिया शेष रहे।
कल्पना करें कि आपके सिर के भीतर एक हजार सूर्यों का प्रकाश चमक रहा है।
जब आप चुप हों, तब भी भीतर उठ रही 'अनहद' ध्वनि को पकड़ने की कोशिश करें।
इतने शांत बैठें कि आपको अपने शरीर के होने का अहसास भी मिट जाए।
बिना किसी व्यक्ति के, केवल प्रेम की ऊर्जा में डूब जाएं। प्रेम करें, प्रेमी की चिंता न करें।
याद रखें कि यह क्षण दोबारा नहीं आएगा। हर क्षण को उसकी पूर्णता में जिएं।
पक्षियों के चहचहाने या पत्तों की सरसराहट के साथ अपनी श्वास की लय को मिलाएं।
महसूस करें कि आपके नाभि केंद्र पर एक काला छेद (Black Hole) है जो सब कुछ सोख रहा है।
जैसे पानी में नमक घुल जाता है, वैसे ही स्वयं को परमात्मा में घुलता हुआ देखें।
जो देख रहा है, उसे भी देखने की कोशिश करें। जब दृष्टा मिट जाता है, तब सत्य प्रकट होता है।
महसूस करें कि आप केवल इस शरीर में नहीं, बल्कि हर जीव और पौधे में मौजूद हैं।
बिना किसी सहारे के, बिना किसी विचार के, केवल शून्यता में ठहरें।
अपनी पूरी ऊर्जा को आकाश की ओर उछाल दें और स्वयं को रिक्त कर लें।
भय और सुरक्षा की इच्छा दोनों को छोड़ दें। जो होगा, उसे स्वीकार करें।
कुछ न करें, कहीं न जाएं। बस 'हैं' इस भाव में गहरे उतरें।
शब्दों के पीछे छिपे अनंत मौन को पहचानें। वही आपका घर है।
महसूस करें कि हृदय में एक स्वर्ण कमल खिल रहा है जो पूरे अस्तित्व को महका रहा है।
जागते, सोते और स्वप्न देखते समय भी यह होश बना रहे कि 'मैं साक्षी हूँ' ।
तू और मैं के भेद को मिटा दें। केवल 'एक' ही शेष है।
न बीता हुआ कल, न आने वाला कल। केवल यह 'अभी' का सनातन क्षण।
महसूस करें कि हर इंद्रिय परमात्मा से मिलने का एक द्वार है।
महसूस करें कि प्रकाश आपके सिर से पैर तक शहद की तरह बह रहा है।
मानसिक रूप से सभी सहारों (संबंध, धन, पद) को छोड़कर अकेलेपन का आनंद लें।
रात के सन्नाटे को सुनें और उस सन्नाटे को अपने भीतर भी महसूस करें।
जैसे बूंद सागर में गिरकर सागर हो जाती है, वैसे ही स्वयं को अस्तित्व को सौंप दें।
कोई प्रयास न करें। सहज रहें, सरल रहें। यही सिद्धि है।
अब न कोई विधि बची, न कोई साधक। केवल आनंद ही शेष है।
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